मैं तो केवल "देवनागरी" जैसे नाम के कारण भी यथास्थिति बनाए रखना चाहूंगी!

मुझे अचरज होता है कि कुछ लोग इसे बदलना क्यों चाहते हैं; वे ऐसी लिपि क्यों अपनाना चाहते हैं, जिसका अपना कोई नाम तक नहीं है और जिसे लैटिन/रोमन की मदद लेनी पड़ती है?

पिछले कुछ समय से हमने हिंदी को लैटिन लिपि में लिखने का चलन देखा है। इसका उपयोग फिल्मों के नामों के लिए किया जाता है, इंटरनेट पर किया जाता है, हिंदी जानने वाले कुछ लोग ईमेल भेजने या एसएमएस भेजने के लिए भी करते हैं। कुछ प्रसिद्ध व्यक्तियों ने सुझाव दिया है कि हमारी राष्ट्र-भाषा हिंदी के लिए इसी लिपि को अपना लिया जाए। मैं पूरी तरह इस विचार के खिलाफ हूँ। इस लेख में, मैं कुछ कारण प्रस्तुत करना चाहती हूँ कि क्यों हमें एक लंबे समय से उपयोग की जा रही वर्तमान देवनागरी लिपि के अलावा किसी अन्य लिपि को अपनाने के बारे में कभी सोचना भी नहीं चाहिए!

मैं एक भारतीय-अमेरिकी हिन्दू हूँ और लगभग पचास वर्षों से अमेरिका में रह रही हूँ।


संयोग से मुझे सात भाषाएँ आती हैं। बंगाली मेरी मातृभाषा है, पंजाबी और हिंदी भी मैं सहजता से बोलती हूं, संभवतः इनमें से एक को मैं अपनी पितृभाषा और दूसरी को राष्ट्रभाषा कह सकती हूँ, और बेशक मुझे अंग्रेज़ी भी आती है, जो हमारी उपनिवेशी भाषा है! मेरे पिताजी ने ऊर्दू और फ़ारसी पढ़ी थी; जो कि तुर्कों, अफ़गानियों, मंगोलों और कुछ अन्य लुटेरी टोलियों द्वारा हमें गुलाम बनाए जाने के एक अन्य प्रयास का परिणाम थी, जो इस देश में आए और यहाँ का वैभव देखकर यहीं बस गए। इसका परिणाम ये हुआ कि मेरे पिताजी और मेरे चाचा-मामा ये भाषाएं पढ़ते और बोलते थे। मेरे पिताजी अक्सर यात्रा के दौरान या छुट्टियों में हमें उर्दू किताबें पढ़कर सुनाते थे। उस समय तक हमारे जीवन में टेलीविजन का अतिक्रमण नहीं हुआ था! हाल के वर्षों में, मैंने कुछ स्पेनिश भी सीख ली है क्योंकि यहां अमेरिका में घरेलू नौकर, माली आदि जैसे लगभग सभी कामों के लिए श्वेत कर्मचारियों के स्थान पर अब लैटिन देशों के लोग आ गए हैं, जो स्पेनिश भाषी हैं, और इसका कारण भी वही है -- स्पेनिश यूरोपियों द्वारा उपनिवेशन!


लगभग 27 वर्षों पूर्व हिन्दू सभ्यता में मेरी गंभीर रुचि जागी और एक अंतःवासी के रूप में मैंने तमिलनाडु के अपने गुरु श्री स्वामी दयानंद सरस्वती जी से शिक्षा ग्रहण की। यहाँ पाणिनि के व्याकरण से मेरा परिचय हुआ और साथ ही मैंने संस्कृत में ब्रह्म सूत्र भी पढ़े। हालांकि मैं इन विषयों में विद्वत्ता का दावा नहीं करुँगी, लेकिन फिर भी इनके संपर्क में आने से मुझे विभिन्न भाषाओं के निर्माण का कारण बननेवाले विभिन्न तरह के विचारों का परिचय मिला! संस्कृत भाषा और व्याकरण मुझे विलक्षण लगते हैं। इस भाषा को देवनागरी लिपि में पढ़ने मात्र से ही अद्भुत व्यक्तित्व विकसित किए जा सकते हैं; संस्कृत भाषा और देवनागरी लिपि का संगम ऐसा है, जैसे इनका दिव्य विवाह स्वर्ग में ही निश्चित कर दिया गया हो (इस अनुमान के आधार पर कि ऐसा कुछ होता है - मुझे आशंका इसलिए है क्योंकि हमें स्वर्ग में भेजने को आतुर रहने वाले सभी लोग खुद संकट में पड़ने पर अस्पताल की तरफ भागते हैं)। यहाँ पढ़ाई अंग्रेज़ी माध्यम में होती थी क्योंकि कई छात्र अमेरिका और दक्षिण अमेरिकी देशों के थे। हिंदी जाननेवाले और हिंदी से प्रेम करने वाली मेरे जैसे व्यक्ति के लिए इन विषयों को समझना बहुत अधिक सरल था क्योंकि संधि के नियम हिंदी जैसे ही थे! मैं यह मानकर चलती हूँ कि अन्य भारतीय भाषाओं में भी ऐसी ही समानताएं हैं। इससे हम मूल-निवासी अन्य लोगों की तुलना में लाभदायक स्थिति में रहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे अंग्रेज़ी या स्पेनिश भाषा से वे लोग लाभदायक स्थिति में रहते हैं, जिन्हें इनमें से केवल एक ही भाषा आती है और वही उनकी मातृभाषा है। केवल इसी एक बात से भी अंग्रेज़ों ने लगभग 200 वर्षों तक बहुत लाभ उठाया है! इसलिए अब हम आगे जो भी परिवर्तन करेंगे, उनमें हमारे हितों का ध्यान रखा जाना चाहिए!

हम भारतीय लोग भाषाओं से प्रेम करते हैं और बहुत सरलता से भाषाएं सीख लेते हैं - इस तथ्य को अब पूरा विश्व सहजता से स्वीकार करने लगा है! हम एक सक्रिय, जीवंत सभ्यता हैं (प्राचीन संस्कृतियों में से प्रत्येक 46 में केवल एक), जहाँ 17 से अधिक आधिकारिक भाषाएँ और असंख्य बोलियाँ हैं। यह आश्चर्य की बात भी है और गर्व की बात भी है!

मैं इस बात को अच्छी तरह जानती हूँ कि संस्कृत श्लोकों के लिए लैटिन/रोमन लिपि का उपयोग भी किया जाता है और यहाँ तक कि भगवद्गीता भी इस तरीके से प्रस्तुत की जाती है। चूंकि मैंने हमारे प्राचीन ग्रंथों के अचूक लेखन के लिए विकसित विशेषक चिह्नों का अध्ययन किया है, अतः मैं इस रूप में लिखे शब्दों को भी पढ़ सकती हूँ। हालांकि, पढ़ने का यह तरीका पूरी तरह अलग है, जो भले ही कठिन न हो, लेकिन फिर भी इसके साथ सहज होने में समय लगता ही है और सहित उच्चारण के लिए मैं देवनागरी को ही प्राथमिकता देती हूँ। संस्कृत भाषा में उच्चारण का महत्व सबसे अधिक है। अंग्रेज़ी उधार के शब्दों वाली अत्यंत अध्वन्यात्मक भाषा है, जिसमें शब्दों को बहुत विचित्र ढंग से आपस में मिलाया गया है। इसमें अनेक अपवाद होते हैं और जिन लोगों की मूल-भाषा अंग्रेज़ी नहीं है, उन्हें इन अपवादों को याद रखना पड़ता है और अक्सर उन्हें ये अतार्किक प्रतीत होते हैं।

मुझे याद है कि जब मैं तीसरी या चौथी कक्षा में पढ़ती थी, तब मेरी शिक्षिका ने हमें सिखाया था कि 'laugh' शब्द की वर्तनी 'L-A-U-G-H' होती है, इसलिए मैंने याद कर लिया कि 'gh' से 'f' की ध्वनि मिलती है; अगली बार जब उन्होंने कक्षा में "High" शब्द लिखा, तो मैंने आत्मविश्वास के साथ अपना हाथ उठाया और रोमांचित होकर "Hif" उत्तर दिया। बेशक उन्होंने मेरी गलती सुधारते हुए मुझे बताया कि इसका उच्चारण "Hi" होता है। तीसरी या चौथी कक्षा का मेरा बाल-मन मुझे समझाता था कि अग्रेज़ी भाषा पर कोई प्रश्न उठाने के बजाय मुझे इधर से उधर टहलते हुए इस डरावनी भाषा को पूरी तरह याद कर लेना है।

वर्तनी से मुझे आज भी समस्या होती है, विशेषतः 'e' और 'a' के बीच संभ्रम के कारण या इस बात को लेकर कि कब अनावश्यक रूप से एक 's' या 'c' जोड़ना है या जब philosophy और psychology के लिए क्रमशः 'F' और 'S' का उपयोग किया जा सकता है, तो आखिर 'ph' की आवश्यकता क्या है?

आइये अब देखें कि जब हम हिंदी को लैटिन/रोमन लिपि में लिखने का प्रयास करते हैं, तो क्या होता है। आइये हिंदी के स्वरों और व्यंजनों के लिए अंग्रेज़ी के स्वरों और व्यंजनों का उपयोग करके देखें।

हिंदी वर्णमाला में 13 स्वर हैं, जबकि अंग्रेज़ी में इनकी संख्या केवल 5 है, इसलिए पहली समस्या यह जानने की है कि वर्ण ‘A’ कब हिंदी में ‘अ’, या ‘आ' या ‘ए’ या ‘ऐ’ के रूप में उपयोग करना है? व्यंजनों का मामला तो और भी उलझा हुआ है। ऐसे कई सारे व्यंजन हैं, जिनके लिए कोई समकक्ष व्यंजन उपलब्ध ही नहीं हैं— भारतीयों में दूसरों को अपना लेने की विलक्षण सहनशीलता है, इसीलिए हास्यास्पद अंग्रेज़ी भाषा के संपर्क में आने के कुछ ही समय बाद, उन्होंने इसे सीखने का प्रयास किया और साथ ही संयुक्ताक्षरों का निर्माण करके यह समस्या सुलझाने की कोशिश भी की, जैसे हिंदी ‘घ’ के लिए ‘gh’, हिंदी ‘झ’ के लिए ‘jh’, हिंदी ‘छ’ के लिए ‘cch’ आदि; इससे हम हिंदी भाषियों को शायद सहायता मिली हो, लेकिन जो लोग केवल अंग्रेज़ी ही जानते हैं, उन्हें इनसे बहुत ज्यादा लाभ नहीं हुआ है। आइये इसे समझने के लिए एक उदाहरण देखें। जो लोग भारत में पले-बढ़े हैं, उन्हें अक्सर V और W के उच्चारण में कोई अंतर महसूस नहीं होता। वास्तव में हिंदी में इन दोनों का उच्चारण 'व' ही होगा। लेकिन इनमें अंतर है: 'V' एक दंत्यौष्ठ्य (labio-dental) ध्वनि है, इसका उच्चारण करते समय दांत निचले होंठ को छूता है; जबकि 'W' एक ओष्ठ्य (labial) ध्वनि है, जिसका उच्चारण करते समय होंठ गोलाकार हो जाते हैं। इन्हें सुनने की आदत हो जाने पर हम इनके बीच अंतर बता सकते हैं।

 

 

आइये अब पुनः इस बात पर लौटते हैं कि जब कोई व्यक्ति लैटिन/रोमन में लिखी हिंदी पढ़ता है, तो वास्तव में यही होता है कि वह इसे पूरी तरह गलत पढ़ेगा, जब तक कि विशेषक चिह्न प्रदान न किए गए हों और वह व्यक्ति उन चिह्नों का अर्थ अच्छी तरह न जानता हो। हिंदी जाननेवाले लोगों को इससे कोई समस्या नहीं होती क्योंकि वे ध्वन्यात्मक रूप से पढ़ने का प्रयास नहीं करते, बल्कि वे सही ध्वनि को पुनर्प्राप्त करते हैं, हालांकि पाठ लंबा होने पर उनकी पढ़ने की गति धीमी हो जाएगी। मेरे बच्चे यहीं अमेरिका में पले-बढ़े हैं और उनके मामले में यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है। वे कुछ हद तक हिंदी पढ़ना और बोलना जानते हैं, लेकिन इतनी नहीं कि वे रोमन लिपि में भी इसे पढ़ सकें।

इन सभी बातों पर विचार करने के बाद, मुझे ऐसा कोई कारण नहीं दिखाई पड़ता कि हमें अपनी राष्ट्रभाषा के साथ कोई छेड़छाड़ क्यों करनी चाहिए। यह अत्यंत ध्वन्यात्मक भाषा है (अर्थात हम जो बोलते हैं, वही लिखते हैं और अर्ध-ध्वनियों के लिए हलंत वर्णों का उपयोग करते हैं)। वास्तव में अंग्रेज़ों को उनकी भाषा में बदलाव करने और उसे अलग ढंग से सिखाने के प्रयास करने चाहिए।

रेणु एस. मल्होत्रा, एमबीए
सोमवार, 14 सितम्बर 2015